By Agatha Android

January 16, 2020

श्रीमद्भगवत   गीता  प्रथम अध्याय

गीता अध्याय-1 

धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव: । मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय  ॥1॥

धृतराष्ट्र बोले- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ? 

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्  ॥ 2॥

संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह रचनायुक्त पांडवों  की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा 

गीता अध्याय-1 

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता  ॥ 3॥

हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डु पुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये

गीता अध्याय-1 

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथ:  ॥4॥

इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद

गीता अध्याय-1 

धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरूजित्कुन्तिभोजश्च शैव्यश्च नरपुंगव:  ॥5॥

धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरूजित्, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैव्य

गीता अध्याय-1 

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथा:  ॥6॥

पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र महारथी हैं

गीता अध्याय-1 

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते ॥7॥

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये। आपकी जानकारी के लिये मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ

गीता अध्याय-1 

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजय:। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च  ॥8॥

आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त पुत्र भूरिश्रवा

गीता अध्याय-1 

अन्ये च बहव: शूरा मदर्थे त्यक्तजीविता: । नानाशस्त्रप्रहरणा: सर्वे युद्धविशारदा:  ॥9॥

और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित और सभी युद्ध में चतुर हैं

गीता अध्याय-1 

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्  ॥10॥

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम[4] द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है

गीता अध्याय-1 

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिता: । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि  ॥11॥

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम[4] द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है

गीता अध्याय-1 

तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्ध: पितामह: । सिंहनादं विनद्योच्चै: शख्ङं दध्मौ प्रतापवान् ॥12॥

कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया 

गीता अध्याय-1 

तत: शाख्ङश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा: । सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्  ॥13॥

इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शोर बड़ा भयंकर हुआ

गीता अध्याय-1 

तत: श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधव: पाण्डवश्चैव दिव्यौ शख्ङौ प्रदध्मतु: ॥14॥

इसके अनन्तर सफ़ेद घोडों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाये

गीता अध्याय-1 

पाज्चजन्यं ह्रषीकेशो देवदत्तं धनंजय: । पौण्ड्रं दध्मौ महाशख्ङं भीमकर्मा वृकोदर:  ॥15॥

श्रीकृष्ण महाराज ने पाज्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्म वाले भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया

गीता अध्याय-1 

अनन्तविजयं राजा कुन्ती पुत्रो युधिष्ठिर: । नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ  ॥16॥

कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये

गीता अध्याय-1 

काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी च महारथ: । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित:  ॥17॥

श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि

गीता अध्याय-1 

द्रुपदो द्रौपदेयाश्चे सर्वश: पृथ्वीपते । सौभद्रश्च महाबाहु: शख्ङान्दध्मु: पृथक्पृथक्  ॥18॥

राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु इन सभी ने, राजन्! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाये

गीता अध्याय-1 

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्  ॥19॥

और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के यानि आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये

गीता अध्याय-1 

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वज:। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरूद्यम्य पाण्डव:  ॥20॥

हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र सम्बन्धियों को देखकर

गीता अध्याय-1 

ह्रषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते  अर्जुन उवाच सेनयोरूभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत  ॥21॥

उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा-हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये

गीता अध्याय-1 

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे  ॥22॥

और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिये

गीता अध्याय-1 

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागता: । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षव:  ॥23॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आये हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा

गीता अध्याय-1 

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरूभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्  ॥24॥

संजय बोले हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्ण चन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच

गीता अध्याय-1 

भीष्मद्रोणप्रमुखत: सर्वेषां च महीक्षिताम्  उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरुनिति  ॥25॥

भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिये जुटे हुए इन कौरवों को देख

गीता अध्याय-1 

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थ: पितृनथ पितामहान | आचार्यन्मातुलान्भ्रातृन् पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा  ॥26॥

इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उस दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों परदादो को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा 

गीता अध्याय-1 

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान्  ॥27॥

उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर वह कुन्ती पुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह बचन बोले

गीता अध्याय-1 

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम्  ॥28॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते  ॥29॥

अर्जुन बोले हे कृष्ण ! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्पन एवं रोमांच हो रहा है

गीता अध्याय-1 

गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्राते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मन:  ॥30॥

हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिये मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ

गीता अध्याय-1 

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे  ॥31॥

हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता

गीता अध्याय-1 

न काड्.क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा  ॥32॥

हे श्रीकृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?

गीता अध्याय-1 

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगा: सुखानि च । त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च  ॥33॥  आचार्या: पितर: पुत्रास्तथैव च पितामहा: । मातुला: श्वशुरा: पौत्रा श्याला: सम्बंधिनस्तथा  ॥34॥

हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्याग कर युद्ध में खड़े हैं। गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं

गीता अध्याय-1 

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोडपि मधुसूदन । अपि त्रलो क्यराज्यस्य हेतो: किं नु महीकृते  ॥35॥

हे मधुसूदन ! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये भी मै इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या है ?

गीता अध्याय-1 

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीतिस्याज्जनार्दन । पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन:  ॥36॥

हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा

गीता अध्याय-1 

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् । स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिन: स्याम माधव  ॥37॥

अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहीं हैं, क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ?

गीता अध्याय-1 

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्  ॥38॥ कथं न ज्ञेयमस्माभि: पापादस्मान्निवर्तितुम् । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन  ॥39॥

यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिए

गीता अध्याय-1 

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मा: सनातना:। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत  ॥40॥

कुल के नाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है

गीता अध्याय-1 

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रिय:। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकर:  ॥41॥

हे श्रीकृष्ण ! पाप के अधिक बढ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है

गीता अध्याय-1 

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च । पतन्ति पितरो ह्रोषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया:  ॥42॥

वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं

गीता अध्याय-1 

दोषैरेतै: कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकै:। उत्साद्यन्ते जातिधर्मा: कुलधर्माश्च शाश्वता:  ॥43॥

इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं

गीता अध्याय-1 

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन । नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम  ॥44॥

हे जनार्दन ! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं

गीता अध्याय-1 

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यता:  ॥45॥

हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान् होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिये उद्यत हो गये हैं

गीता अध्याय-1 

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणय: । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्  ॥46॥

यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिये हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा

गीता अध्याय-1 

एवमुक्त्वार्जुन: संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानस:  ॥47॥

संजय बोले रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाला अर्जुन इस प्रकार कहकर बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया

गीता अध्याय-1